पितृपक्ष और भ्रांतियां
1 भ्रांति -पितृपक्ष में कोई कार्य नहीं करना चाहिए। तथ्य- यह एक विशिष्ट अवसर है, जिसमें हमें अपने पितरों व gaya बुजुर्गों का आदर एवम हिन्दु धर्म में वर्णित तर्पण एवम श्राद्ध आदि करना चाहिए। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अन्य दैनिक कार्य भी न करें। जिस कार्य का जो शास्त्र अनुसार काल या मुहूर्त बताया गया हो, वो जरूर करें। 2 भ्रांति - पितृपक्ष उसके लिए है जिसके पिता व माता नहीं हैं। तथ्य- यह नित्य कर्म के अंतर्गत समाहित किया गया है। जिसके संकल्प में श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तये इसकी कामना है। सभी को इस काल खण्ड में अपने पूर्वजों को स्मरण एवम उनके मृत तिथि को दानादि एवम तर्पण आदि अवश्य करनी चाहिए। 3 भ्रांति - गया श्राद्ध सम्पन्न होने के बाद पितृपक्ष में तर्पणादि नहीं होगा। तथ्य- ये विधि विरुद्ध है। आपको गया श्राद्ध के बाद भी तर्पणादि अवश्य करनी चाहिए। 4 भ्रांति - पितृपक्ष में आवश्यक नहीं है कि हम तर्पणादि करें। तथ्य- आपको अपनी धार्मिक ,पारम्परिक, सामाजिक तथा मानव जीवन की अभ्युन्नति के लिए जरूर इस पक्ष विशिष्ट में अवश्य तर्पणादि करनी चाहिए जिससे , आधिदैविक, आधिभौतिक एवम आध्यात्मिक ताप- त्रय से निवृति एवम अभीष्ट की सिद्धि हो सके। जब भी अनुकूल श्रम करने के बाद भी जीवन में सफलता बाधित दिखे तो अपने पितरों को जरूर याद कर तर्पणादि करें। 5 भ्रांति- वर्तमान वर्ष में पिता या माता दिवंगत हो गए तो उसी वर्ष पड़ने वाले पितृपक्ष में तर्पणादि नहीं होगा। तथ्य- उस वर्ष भी तर्पणादि। किया जाएगा परन्तु पिंडदान आदि कार्य नहीं होंगे। 6 भ्रांति- भैया करते हैं तर्पणादि तो हम क्यों करें। तथ्य - यह कार्य प्रत्येक भाई के लिए है ,वे अवश्य करें।