*आज का नक्षत्र*
*पुनर्वसु नक्षत्र* बुध की राशि मिथुन और चंद्रमा की राशि कर्क में आने वाला गुरु के स्वामित्व का नक्षत्र पुनर्वसु, इस नक्षत्र की इष्ट देवता है अदिति और चिन्ह है तीर और धनुष। नई शुरुआत , स्वच्छता और अच्छाई का नक्षत्र पुनर्वसु। धनुष और बाण का मतलब है बुराई के साथ एक युद्ध और अच्छाई की शुरुआत, पुनर्वसु नक्षत्र अध्यात्म के ज्ञान का दिव्य प्रकाश कहलाता है जिससे अज्ञान का अंधेरा समाप्त होता है, ज्ञान , सत्य और धर्म का शांति प्रदान करता है पुनर्वसु , जो इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग अपने नैतिक मूल्य, सिद्धांतों और संस्कारों से बंधे होते है। परिस्थिति विशेष के चलते अगर अपनी राह से ऐसे लोग भटक भी जाते हैं पुनः अपने मार्ग पर लौट आते हैं, इस नक्षत्र की इष्ट देवी अदिति जातकों को रचनात्मक ज्ञान का भंडार प्रदान करती है। अदिति पृथ्वी तत्व की देवी है जो सब कुछ बहुतायत में देती है, अतः इस नक्षत्र में जन्मे लोगो में धन की कभी कमी नहीं होती। ये लोग आजादी और तरक्की पसंद करते है तथा अपने धन कमाना इनके नैसर्गिक गुणों में शामिल होता है। गुरु और बुध के स्वामित्व की वजह से इस नक्षत्र के जातक वाक पटू हो कर संवाद कला में निपुण होते है, अपनी वाणी के दम पर ये किसी को भी आकर्षित करने की काबिलियत रखते है। धनुष पर चढ़े बाण का एक अर्थ ये भी होता की अपनी बुद्धि बल से सफल परियोजनाओं की शुरुआत करना। भगवान श्री रामचंद्र जी का जन्म नक्षत्र भी पुनर्वसु ही था, किस प्रकार से वो न सिर्फ अज्ञान के अंधेरे को बल्कि अधर्म को भी समाप्त करने की लड़ाई लड़ते रहे। रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना भी भगवान राम ने अपने जन्म नक्षत्र पुनर्वसु के दिन ही की थी।