चर्म रोग
चर्म रोग
शास्त्रो मे सबसे बडा सुख कहा जाता है तो निरोगी काया जब शरीर स्वस्थ हो तो संसार का हर सुख प्राप्त किया जा सकता है और अगर शरीर ही अवस्थ है तो कुछ भी मील जाऐ कोई काम का नही रह जाता संसार मे रोग तो बहुत है पर उन रोगो मे से बात करते हैं चर्म रोग कई तरह से होता है जीसमे कुछ ज्योतिष कारण भी है शरीर की चमड़ी का कारक ग्रह बुध होता है। कुंडली में बुध की स्थिति से कुंडली में बुध जितनी उत्तम अवस्था में होगा, जातक की चमड़ी उतनी ही चमकदार एवं स्वस्थ होगी। यदि कुंडली में बुध पाप ग्रह राहु, केतु या शनि के साथ किसी भी भाव में बैठा हो या दृष्टि से सम्बन्ध बन रहा हो तो चर्म रोग होने के पूरे आसार बनेंगे। इसमें रोग की तीव्रता ग्रह की प्रबलता पर निर्भर करती है। या ग्रह किस नक्षत्र में कितना प्रभावशाली है यह भी रोग की भीषणता बताता है क्योंकि एक रोग सामान्य सा उभरकर आता है और ठीक हो जाता है। दूसरा रोग लंबा समय लेता है, साथ ही जातक के जीवन में चल रही महादशा पर भी निर्भर करता है। :
यदि मंगल किसी भी तरह से पाप ग्रहों से ग्रस्त हो, नीच हो, शत्रु राशि हो या वक्री हो तो वह रक्त संबंधी रोग पैदा करेगा। यदि मंगल बुध का योग होगा तो रक्त या चर्म रोग की समस्या अवश्य खड़ी होगी यदि मंगल और केतु बुध छठे या बारहवें स्थान में हो तो चर्म रोग होता है। यदि मंगल और शनि छठे या बारहवें भाव में हों तो यदि मंगल षष्ठेश के साथ हो तो चर्म रोग होता है। यदि षष्ठेश शत्रुगृही, नीच, वक्री अथवा अस्त हो तो चर्म -रोग होता है। यदि षष्ठेश पाप ग्रह होकर लग्न, अष्टम या दशम स्थान में बैठा हो तो चर्म-रोग होता है। यदि बुध और राहु षष्ठेश और लग्नेश के साथ हो तो चर्म-रोग होता है।
चन्द्र मंगल शनि शुक्र जल राशि मे हो और लग